Friday, 9 September 2011

जंगल को गाने दो( हाइकु)


डॉ सुधा गुप्ता

मनमौजी है
जंगल को गाने दो
अपना गीत

हरे पन्ने पे
रचते आरण्यक
ये वन -ॠषि

इन्हें न काटो
पावन वेद-ॠचा-
सी यह सृष्टि

ममतामयी
जड़-चेतन प्रति
वत्सल दृष्टि

तृषा बुझाने
इनके कारण ही
होती वृष्टि

गीत बुनती
गहरे सन्नाटे में
कोई गौरैया

बोल उठता
अचानक मस्ती में
वो पपीहरा





असंख्य जीव
पाते हैं संरक्षण
इनकी गोद

कस्तूरी मृग
निर्भय विचरण
मनाते मोद

मत उजाड़ो
सबको कुछ देता
कुछ न लेता

कभी न छीनो
वन्य जीवों का घर
भू रही चेता

स्वाधीन ,मुक्त
स्वयं की मस्ती डूबा
सबका मीत

आत्मविभोर
प्रभु-भक्ति में लीन
सबसे प्रीत

मनमौजी है
जंगल को गाने दो
अपना गीत
-0-

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