Friday, 9 September 2011

रैन बसेरा [चोका]*


डॉ सुधा गुप्ता

रैन बसेरा
चल, उठाले डेरा
हुआ सवेरा
क्या भला यहाँ मेरा
जो कुछ मिला
सब यहीं निबेरा
दु:खों से घिरा
खुद लाचारों -द्वार
था चकफेरा
मेरी मूरखता थी
करुणाघन !
कभी तुझे न टेरा
दो बूँद जल !
मुमूर्षु चातक ने
तुझे है हेरा
एक आस लगी है
तारनहार !
कर दो बेड़ा पार
दीन वत्सल !
करो जुगत ऐसी
फिर  से न हो फेरा ।
-0-
*[चोका=जापानी लम्बी कविता, जिसमें 5+7……के क्रम में कविता लिखी जाती है और नत में एक ताँका [5+7-5+7+7] जोड़ दिया जाता है ।

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