ताँका जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य शैली है । इस शैली को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे । हाइकु का उद्भव इसी से हुआ । इसकी संरचना 5+7+5+7+7=31वर्णों की होती है।एक कवि प्रथम 5+7+5=17भाग की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग 7+7 की । यह क्रम चलता रहता था । कभी सूत्रबद्धता के कारण यह संख्या 100 तक भी पहुँच जाती थी ।
मैंने ने सन् 2000 में ताँका की रचना शुरू की थी । 2004 और 2009 के संकलनों में इनके कुछ ताँका भी छपे थे ।
इस अंक में “सात छेद वाली मैं” ताँका -संग्रह से सात ताँका दिए जा रहे हैं ।
1
बाँस की पोरी
निकम्मी खोखल मैं
बेसुरी , कोरी
तूने फूँक जो भरी
बन गई ‘बाँसुरी’
2
तेरा ही जादू
दूध पीना भूला है
गैया का छौना
चित्र -से मोर ,शुक
कैसा ये किया टोना
3
मिली झलक
लगी नहीं पलक
रूप सलोना
श्याम ने किया टोना
राधिका भूली सोना
4
बाँस कि पोरी
बनी रे मुरलिका
श्याम दीवानी
राधिका रो-रो मरे
चुराए, छिपा धरे
5
कान्हा क्या गए
राधा हुई बावरी
कैसी विकल
सदा गीला आँचल
सूखे न किसी पल
6
चाँदनी -स्नात
शरद-पूनो रात
भोर के धोखे
पंछी चहचहाते
जाग पड़ता वन
7
बड़ी सुबह
सूरज मास्टर दा’
किरण-छड़ी
ले, आते धमकाते
पंछी पाठ सुनाते
-0-
डॉ सुधा गुप्ता
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