Friday, 9 September 2011

हाइकु( प्रकृति)


परिचय
डॉ सुधा गुप्ता
जन्म - 18-5-1934
जन्म -स्थान- मेरठ ( उ.प्र.) भारत
शिक्षा- एम.ए., पी-एच.डी., डी.लिट्.
कार्यक्षेत्र- चौंतीस वर्ष वि.वि. के उत्तर-स्नातक महाविद्यालयों में आचार्य/प्राचार्य, अब सेवा निवृत्त।अब पूर्णत: लेखन को समर्पित
डॉ सुधा गुप्ता के  कुछ हाइकु
[प्रो, सत्यभूषण वर्मा कहते हैं –‘सुधा गुप्ता के हाइकुओं का मूल प्राण प्रकृति के रूप सौन्दर्य, उसके क्षण-क्षण परिवर्तित परिवेश और उससे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं की सक्षम अभिव्यक्ति है। उनका प्रत्येक हाइकु एक लघु शब्द चित्र है । ]

1- मेघ-शशक
करने छिड़काव
 पावस आया ।
2- फटती गई
 अँधेरे की चादर
 चाँद उघरा।
3- नन्हा घोंसला
 बिल्ली की ताँक-झाँक
 सहमी शाख ।
4- चन्द लकीरें
समय खींच गया
 देह की माटी ।
5- साथ जो  छूटा
 दुःख पहाड टूटा
 जीवन रूठा।
6-न काटो पेड़
 बाबुना[1] जो आएगी
कहाँ गाएगी ?
7-भटक गई
यादों के बीहड़ में
वहीं बसी हूँ ।
8-आँसू क्यों ढाऊँ ?
दुःख से मिलूँ गले
तुम्हें ही पा लूँ ।
9- ढंग अनूप
 बरगद के नीचे
 सुस्ताली धूप।
10- आग का गोला
 डुबकी मार गया
 हरे समुद्र ।
11- धूप के पाखी
 आँगन में फुदकें
 चढ़े मुँडेर ।
12- असंख्य जीव
 ममता भरी गोद
 मनाते मोद ।
13- लाल गुलाल
पूरी देह पै लगा
 हँसे पलाश ।
-0-
‘बाबुना जो आएगी’ -संग्रह से साभार
[1]  [बाबुना एक छोटी पीले रंग की पंछी है जो पेड़ों की ऊँची शाखाओं में बैठकर गीत गाना पसन्द करती है। ]



21 हाइकु


 1
बर्फ़ के फाहे
आहिस्ता गिर रहे
धुनी रुई -से
2
मेघ मुट्ठी में
कैद चाँद फिसला
निकल भागा !
3
बज उठते
सन्नाटे के घुँघरू
पाखी के स्वर !
4
खुशी अकेले
बाँटी सबके साथ
दोबाला हुई !
[ दोबाला = दुगुनी ]
5
नीला कालीन
चर गए शशक
दूब के धोखे !
6
हिरना आँखें
तीर-सी बिध गई
भोले मन में !
7
चिड़िया रानी
चार कनी बाजरा
दो घूँट पानी !
8
कूकी जो पिकी
' छ्न्न' दोपहरिया
काँच-सी टूटी !
9
कौन पानी पी
बोलती री चिड़या
इतना मीठा
10
पौष की रात
नीम की शाख से झाँकी
चाँद की फाँक !
11
यादों के छौने
मन की डगर से
छलाँग गए
12
नींद में पेड़
मुस्कुराया कली का
सपना आया
13
पलक पाँव
सपनों की झालर
उलझ गई
१४
धूप जल में
आँखे मूँद नहाते
ठिठुरे पंछी !
15-
खिड़की पर
काँप रही गौरैया
पानी से तर
16-
पत्तियाँ ओढ़े
बैठी रही चिड़िया
रात, पानी में
17-
हवा उड़ाती
बादलों की पतंग
डोर न माँझा
18-
आई बरखा
आँचल की हवा दे
गले लगाया
19-
बाराती मेघ
आकाश-मण्डप में
इतरा बैठे
20-
टूटा घोंसला
बेघर हुई मैना
सहमी बैठी
21-
मचल रहा
नन्हा-मुना सूरज
स्कूल न जाऊँ
-0-

गर्मी(हाइकु)-1


: डॉ सुधा गुप्ता
 1
तन्दूत तपा
धरती रोटी सिंकी
दहक लाल
2
आग का गोला
फट गया सुबह
बिखरे शोले
3
सूखे गले से
कलप रही हवा
घूँट पानी के
4
लपटों -घिरा
अगिया बैताल-सा
लू का थपेड़ा
5
आग की गुफ़ा
भटक गई हवा
जली निकली
6
फटा पड़ा है
हज़ार टुकड़ों में
पोखर-दिला
  
7
धूप से तपा
देह पर फफोले
ले, दिन फिरा
8
कुपिता धरा
अगन-महल में
आसन-पाटी
9
धूप दरोगा
गश्त पर निकला
आग-बबूला
10
जेठ की आँच
हवाएँ खौलती हैं
औटते जीव
11
पानी की धुन
सूखे गले भटके
राजा मछेरा*
12
धधक रही
लाल पीली कनेर
सरकों पर

13
फूलों से लदा
बूला होशो-हवास
अमलतास
14
हत शोभाश्री
निर्जला उपासी
जेथ की धरा
15
उबल रहे
ब्रह्माण्ड के देग में
चर-अचर
16
वन-अरण्य
जलें रूई मानिन्द
लपटें, धुँआ
17
आया है द्वार
धूल-भरी झोली ले
जोगी बैसाख
18
अंगारे बिछा
सोने चली धरती
लपटें ओढ़

19
नीम-बेहोश
करवट  से लेटी
है दोपहरी
20
तक़्न है रूखा
होंठों जमीं पपड़ी
वैशाखी धरा



21
प्यासी चिड़िया
ख़ुश , टोंटी में छिपा
दो बूँद पानी
22
कुँए , छबील
प्यास  बूझने वाले
मीत लापता


23
सती का शव
काँधे डाले घूमते
बौराए  रुद्र
24
गुलमोहर
खिला, आग रंग की
 धूप -छतरी
-0-
* किंग फिशर

गर्मी के हाइकु


 :डॉ सुधा गुप्ता

1
फिरते पत्ते
जूते चटकाते-से
काम न धाम
2
धूप से डर
पीली छतरी खोले
खड़ा वैशाख
3
नदिया सूखी
तपाता है सूरज
प्यासे हैं पंछी
4
लू के थपेड़े
औ’ धूप के अंगार
जेठ गुस्साया
5
गर्म बेचैन,
धूपीले अनमने
उबाऊ दिन
6
अकेली ऊबी
हवाख़ोरी को चली
तपती शाम

7
सूरज खफ़ा
चलीं किरन बर्छी
धूप के तीर
8
बाँसों के वन
तनिक सी भूल स
लगती आग
9
तपा सूरज
जले दिल पेड़ों के
बिलखी धरा
10
जानलेवा लू
इश्कपेंचा के फूल
लौटे धूल
11
कूकी जो पिकी
‘छन्न दोपहरिया
काँच-सी टूटी
12
धूप ने छला
काला हुआ हिरन
पानी न मिला

13
जेठ की गर्मी
सब झुलस रहे
मोगरा खिला
14
कूकी कोयल
चीरा-सा लगा गई
टपका लहू
15
बन्दगी , दुआ
सब कुछ भूले हैं
पसीना चुआ
16
वनों की आग
राष्ट्रीय सम्पत्ति को
करती राख
17
धूप से जली
क्षीण कटि नदिया
गुम-सुम-सी
18
ढंग अनूप
बरगद के नीचे
सुस्तात्ती हवा

19
गर्मी की रात
जलता तन-मन
बात-बेबात
20
नहीं बोलती
जंगल में  डोलती
अकेली हवा

21
कलेजे बसा
जले पेड़ों का दु:ख
रोगिणी हवा
22
घर-आँगन
धूल की मेहमानी
करते थके

23
पका सूरज
खेतों में फैले पड़े
गेहूँ के थान
24
भभक उठी
आँवाँ बनी धरती
पकते जीव

-0-